अफगानिस्तान की महिला क्रिकेटर का दावा- आईसीसी ने नहीं की मदद, देश छोड़ना सबसे दुखद रहा

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लंदन. अफगानिस्तान इन दिनों बड़ी परेशानी से गुजर रहा है. देश पर तालिबान (Taliban) ने कब्जा कर लिया है. लेकिन सबसे अधिक दिक्कत महिलाओं को हाे रही है. अफगानिस्तान क्रिकेट टीम की सदस्य रोया शमीम (Roya Samim) अपनी दो बहनों के साथ देश छोड़कर कनाडा चली गई हैं. उन्होंने कहा कि सभी महिला खिलाड़ियों ने आईसीसी (ICC) से मदद मांगी, लेकिन उनकी ओर से कुछ नहीं किया गया. पिछले साल अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड (ACB) की ओर से 25 महिला खिलाड़ियों को सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट दिया गया था.

गार्जियन की खबर के अनुसार, सभी महिला खिलाड़ियों ने आईसीसी को सुरक्षा को लेकर मेल किया था. रोया शमीम ने कहा, ‘सभी खिलाड़ियों ने आईसीसी को मेल किया, लेकिन उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. वे हमें जवाब क्यों नहीं देते. वे हमें क्यों नहीं मानते. हमारे साथ ऐसा व्यवहार करते हैं कि जैसे हम इस दुनिया में मौजूद नहीं हैं.’ हालांकि आईसीसी ने कहा कि उन्हें मदद को लेकर किसी तरह का मेल नहीं मिला है. हम अफगानिस्तान बोर्ड के साथ मिलकर स्थिति पर नजर रखे हुए हैं. शमीम और उनकी 2 बहनें तालिबान के आने से पहले काबुल से निकल गई थीं.

तालिबान लड़कियों की पढ़ाई के खिलाफ, खेल तो दूर की बात

उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान छोड़ना मेरे लिए दुखद दिनों में से एक है. मेरा सबकुछ छूट गया. नौकरी, क्रिकेट, टीम की साथी खिलाड़ी, मेरा घर, मेरे रिश्तेदार, सबकुछ. मैं जब उस दिन को याद करूंगी तो रोने लगूंगी. तालिबान जब पिछली बार सत्ता में आया था, तो उसने महिलाओं की पढ़ाई और काम करने पर रोक लगा दी थी. रोया शमीम ने कहा कि तालिबान लड़कियों की पढ़ाई के खिलाफ हैं. ऐसे में वे हमें खेलने क्यों देंगे.

साथी खिलाड़ियों की चिंता सता रही

रोया शमीम ने बताया कि उन्हें अपने साथी खिलाड़ियों की चिंता सता रही है. टीम की अन्य खिलाड़ी अभी अफगानिस्तान में हैं और डरी हुई हैं. वे घराें में बंद हैं. उन्होंने बताया कि वे दुखी हैं और लोगों से मदद मांग रही हैं. फीफाप्रो की मदद से 77 युवा महिला एथलीट और फुटबॉल टीम की सदस्यों को देश के बाहर निकाला गया. इतना ही नहीं दो पैरालंपिक एथलीट की भी मदद की गई, लेकिन महिला क्रिकेटरों को छोड़ दिया गया.

हमारे क्रिकेट बोर्ड के कहा- इंतजार कराे

रोया शमी ने बताया कि जब तालिबान ने काबुल में प्रवेश किया तब हमने आईसीसी से महिला खिलाड़ियों को बचाने की अपील की. अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड भी कुछ नहीं बोल रहा, उसने सिर्फ यही कहा कि इंतजार करो. हालांकि आईसीसी लगातार अफगानिस्तान पर नजर बनाए हुए है. अगर महिला टीम के खेलने पर रोक लगाई जाती है, तो उसकी पूर्ण सदस्यता भी जा सकतर है. 28 साल की शमीम अफगानिस्तान में मैथ्स पढ़ाती थीं. वे कनाडा में अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए बीबीए कर रही हैं. वे क्रिकेट खेलना जारी रखना चाहती हैं और देश की महिला क्रिकेट को बढ़ते देखना चाहती हैं.

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उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को खुशी और शांति से रहने का अधिकार है. लेकिन अफगानिस्तान अभी लोगों के रहने के लिए सही जगह नहीं है. खासतौर पर लड़कियों के लिए. आगे क्या होने वाला मुझे नहीं पता. तालिबान अपने वादों को तोड़ता रहा है. लेकिन रोया शमीम ने अंत में कहा, ‘मैंने उम्मीद बनाए रखी है. अफगानिस्तान की महिला क्रिकेट टीम होनी चाहिए. अगर तालिबान इसे स्वीकार ना करे तो दूसरे देश में खेलना चाहिए. हम अफगानिस्तान के झंडे के नीचे ही खेलना चाहते हैं.’

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