Tokyo Paralympics: कभी था पहलवान बनने का सपना, एक हादसे ने बदली जिंदगी और अब भाले से दिलाया सोना

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नई दिल्ली. भारत के लिए टोक्यो पैरालंपिक (Tokyo Paralympics) में सोमवार का दिन ऐतिहासिक रहा. भारत ने अकेले सोमवार को दो गोल्ड जीते. दिन की शुरुआत शूटिंग में 19 साल की अवनि लेखरा (Avani Lekhara) के गोल्ड से हुई तो शाम होते-होते जेवलिन थ्रो में सुमित अंतिल (Sumit Antil Gold) ने अपने भाले से देश का भाल चमका दिया. हरियाणा के सुमित ने 68.55 मीटर दूर भोला फेंक देश की झोली में टोक्यो पैरालंपिक का दूसरा गोल्ड डाला. सुमित ने वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम करते हुए सोने का तमगा अपने नाम किया है. उनकी कामयाबी से पूरा देश खुश है. हालांकि, सुमित के लिए यहां तक पहुंचने का सफऱ उतार-चढ़ाव भरा रहा है.

सुमित ने कभी पहलवान बनने का सपना देखा था. उनके लिए पहलवानी जुनून था. वो हरियाणा के सोनीपत जिले के खेवड़ा गांव के अखाड़े में दांव-पेच सीख रहे थे. लेकिन 2015 में हुए एक हादसे ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी. दरअसल, वो अपनी मां से यह कहकर घर से निकले कि मैं थोड़ी देर में घऱ आता हूं. लेकिन 17 साल के सुमित को क्या पता था कि इसके बाद वो कभी रेसलिंग मैट पर दांव-पेच आजमा नहीं पाएंगे. क्योंकि घर से कुछ दूर जाते ही उनकी बाइक का एक्सीडेंट हो गया और एक झटके में उनके पहलवान बनने का बरसों पुराना सपना चकनाचूर हो गया.

हादसे की वजह से पहलवान बनने का सपना टूटा था: सुमित
सुमित ने टाइम्स ऑफ इंडिया डॉट कॉम को दिए इंटरव्यू में इस हादसे और कुश्ती को लेकर अपने जुनून के बारे में खुलकर बात की. उन्होंने बताया कि योगेश्वर दत्त कुश्ती में मेरी प्रेरणा थे. मैंने हमेशा उनके वीडियो और मुकाबलों को देखा और उनसे सीखा था. लेकिन जब मैं 2015 में एक सड़क दुर्घटना का शिकार हुआ, तो मेरी कुश्ती की यात्रा का दुखद अंत हो गया. मैं 2015 में अपनी बाइक से जा रहा था और एक ट्रैक्टर ने पीछे से मेरी बाइक को टक्कर मार दी. मैं सड़क पर फिसल गया. ट्रैक्टर का ड्राइवर वक्त पर ब्रेक नहीं लगा पाया और ट्रैक्टर का पहिया मेरे बायें पैर के ऊपर से गुजर गया.

सुमित ने आगे बताया कि इस हादसे में मेरा बाया पैर बुरी तरह कुचल गया था. मुझे अस्पताल पहुंचाया  गया. तब मेरे पैर की हालत देखकर डॉक्टर ने कहा कि इसे काटना पड़ेगा. मेरा परिवार अस्पताल में ही फूट-फूटकर रोने लगा था. मैं भी खुद को गालियां दे रहा था. मेरे पास कोई विकल्प नहीं था. इस तरह मेरे पहलवान बनने के सपने का बुरा अंत हो गया.

हादसे में पैर गंवाने के बाद मायूस थे सुमित
इस हादसे से सुमित मायूस थे. लेकिन पूरी तरह टूटे नहीं थे. वो स्पोर्ट्स में ही अपना करियर बनाना चाहते थे. वो अखाड़े के बाहर बैठकर दूसरे पहलवानों को मेडल जीतते हुए ही जिंदगी नहीं बिताना चाहते थे. इसके बाद उनकी मुलाकात वीरेंद्र धनकड़ से हुई. वीरेंद्र 2018 के एशियन गेम्स के शॉट पुट इवेंट में सिल्वर जीत चुके थे. सुमित ने वीरेंद्र से मदद मांगी. धनकड़ उन्हें दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में पैरा एथलीट्स को ट्रेनिंग देने वाले जेवलिन थ्रो के कोच नवल सिंह के पास ले गए. नवल ने सुमित की पूरी कहानी सुनी और उनकी कद-काठी देखकर जेवलिन थ्रो अपनाने की सलाह दी. बस, यहीं से सुमित का इस खेल से जुड़ाव हुआ और वो टोक्यो पैरालंपिक में विश्व रिकॉर्ड के साथ गोल्ड जीतने में सफल रहे.

Tokyo Paralympics: सुमित अंतिल ने टोक्यो पैरालंपिक में वर्ल्ड रिकॉर्ड के साथ जीता गोल्ड मेडल

कोच नवल सिंह ने बदली सुमित की किस्मत
कोच नवल ने बताया कि शुरू में सुमित को प्रेरित करना बहुत मुश्किल था. क्योंकि वो पहलवान बनना चाहता था. लेकिन बिना पैर के ऐसा संभव नहीं था. उनका कद 6 फीट 2 इंच था और शरीर भी मजबूत था. मुझे पता था कि अगर मैंने सुमित पर मेहनत की तो वो चमत्कार कर सकता है. आखिरकार मैं अपनी कोशिश में कामयाब रहा और सुमित ने जेवलिन थ्रो की ट्रेनिंग शुरू कर दी. उनमें गजब का अनुशासन और जुनून है. वो सुबह 3 बजे ही मैदान पर पहुंच जाते थे. मैंने उनके जैसा समर्पित खिलाड़ी नहीं देखा.

सुमित ने अपने पहले पैरालंपिक में ही गोल्ड जीता
सुमित ने 2019 विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत पदक जीतने के बाद, F64 श्रेणी में टोक्यो पैरालिंपिक के लिए अपना टिकट बुक किया था और 23 साल की उम्र में ही अपने पहले पैरालंपिक खेलों में गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया. उन्होंने अपना पदक भी कोच नवल सिंह को समर्पित किया है.

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