DNA ANALYSIS: भारत पर वार के लिए तालिबान बनेगा हथियार? जानिए क्यों उठ रहा है ये सवाल

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नई दिल्ली: तालिबान (Taliban) ने ऐलान किया है कि वो दुनिया के सभी देशों के साथ राजनीतिक और व्यापारिक रिश्ते चाहता है और वो किसी भी मुल्क के भी खिलाफ नहीं है. तालिबान ने दावा किया कि उसने किसी देश के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ने का फैसला नहीं किया है. इन बातों को सुन कर आपको ऐसा लगेगा कि तालिबान ने रातों रात अपना मेक ओवर (Make Over) कर लिया है और वो अफगानिस्तान (Afghanistan) में लोकतांत्रिक देशों जैसी ही सरकार चलाएगा. 

‘भारत की चिंता का विषय’

तालिबान अपने इस दूसरे कार्यकाल में महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान देने जैसी बड़ी-बड़ी बातें और दावा कर रहा है लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर और एकदम उलट है क्योंकि तालिबान का असली चेहरा ये नहीं है. सच्चाई ये है कि तालिबान कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा से ग्रस्त है.

विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक तालिबान ने कंधार और हेरात में बन्द पड़े भारतीय दूतावास (Indian Consulate) का ताला तोड़ दिया और अन्दर रखे सामान के साथ भी छेड़छाड़ की. तालिबानी लड़ाके इंडियन काउंसलेट में खड़ी बुलेट प्रूफ गाड़ियां भी अपने साथ ले गए.

ISI का दखल जारी

ये सारा घटनाक्रम पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के इशारे पर अंजाम दिया गया. यानी अफगानिस्तान में ISI की गहरी दिलचस्पी देखने को मिल रही है जो भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है. दरअसल ISI और तालिबान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और भारत को दोनों से ही खतरा है. अब एक बड़ी चिंता ये भी है कि अमेरिका जो हथियार अफगानिस्तान की सेना के लिए छोड़ कर गया था, वो अब तालिबान के हाथ लग गए हैं. ये हथियार लश्कर ए तैयबा (LeT) और जैश ए मोहम्मद (JeM) जैसे आतंकी संगठनों को मिल सकते हैं जो वहां से कश्मीर (Kashmir) पहुंच सकते हैं.

तालिबान के नापाक मंसूबे

इस समय तालिबान के कब्जे में 45 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर (Black Hawk Helicopters) हो सकते हैं, जो अमेरिका (US) ने अफगानिस्तान को दिए थे. वहां पर मौजूद 11 सैन्य ठिकाने और वहां मौजूद हथियारों का जखीरा भी तालिबान के हाथ लग चुका है. एक रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान के पास अब इतने हथियार हैं कि, वो युद्ध लड़ सकता है. इसके अलावा तालिबान अपनी खुद की सेना का गठन भी करना चाहता है और इसके लिए उसने एक भर्ती अभियान भी शुरू कर दिया है.

हिजबुल मुजाहिद्दीन के आतंकी का कबूलनामा

पिछले 20 वर्षों में जब तक अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ लड़ाई लड़ी, तब तक तालिबान को सबसे ज़्यादा समर्थन पाकिस्तान और वहां के लश्कर और जैश जैसे आतंकवादी संगठनों से ही मिला. इसलिए आज जब अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी हुई है तो ऐसे आतंकी संगठनों को पता है कि तालिबान जेहाद और अहसान उतारने के नाम पर इनके लिए कुछ भी करेगा. इससे कश्मीर फिर से अशांत हो सकता है.

वहीं हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी सैयद सलाहुद्दीन ने कहा कि तालिबान कश्मीर में उनकी मदद जरूर करेगा. सलाहुद्दीन का ये बयान साफ-साफ संकेत दे रहा है कि तालिबान की जीत अब कश्मीर की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन सकती है.



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