वेब सीरीज ‘दिल्ली क्राइम’ को मिला इंटरनेशनल एम्मी अवार्ड्स क्या ऑस्कर से कम है?

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मुंबई. भारत से जब कोई फिल्म ऑस्कर (Oscar) के लिए भेजी जाती है, तो खूब सुर्खियां पाती है. और खुदा न खास्ता अगर फिल्म को ऑस्कर में नॉमिनेशन मिल गया तो बल्ले-बल्ले है. खिताब मिले ना मिले, नॉमिनेशन मिलने भर से उन्माद भरा एक जश्न सा शुरू हो जाता है. होना भी चाहिए, क्योंकि ऑस्कर पुरस्कार का जलवा और रुतबा ही ऐसा है कि दुनिया भर के फिल्मकार इसके नॉमिनेशन में नाम आ जाने भर को ही ताउम्र भुनाते हैं.

निश्चित रूप से फिल्म बिरादरी के लिए यह सबसे बड़ा सम्मान है. ऐसे ही संगीत की दुनिया के लिए ग्रैमी अवार्ड्स और टीवी की दुनिया के लिए एम्मी अवार्ड्स हैं, जिनमें दुनिया के कोने-कोने से प्रविष्टियां भेजी जाती हैं. ग्लोब अवार्ड्स सहित कुछ अन्य अवार्ड्स भी हैं, जिन्हें फिल्म, टीवी और संगीत की दुनिया के कलाकार जीवन में कम से कम एक बार पाने की चाह रखते हैं और बहुतेरे ऐसे भी हैं जो इसके लिए जी तोड़ मेहनत भी करते हैं. प्रतिस्पर्धा कड़ी होती है, इसलिए प्रतिभाशाली होने के बावजूद कई बार एक कलाकार को लंबा अरसा लग जाता है, ऐसे किसी पुरस्कार को पाने में. फेहरिस्त बहुत लंबी है.

हाल ही में दिल्ली क्राइम, नामक एक वेब सिरीज को प्रतिष्ठित 48वें इंटरनेशनल एम्मी अवार्ड्स (International Emmy Awards) से नवाजा गया. ओटीटी मंच नेटफ्लिक्स ओरिजिनल्स की यह ड्रामा श्रेणी में विजयी होने वाली यह पहली भारतीय वेब सिरीज है, लेकिन इस सिरीज की कामयाबी पर ऑस्कर नॉमिनेशन जैसा शोर शराबा नहीं देखा गया. कोरोना का पहलू थोड़ी देर के लिए अलग रख दें, जिसकी वजह से पहली बार यह कार्यक्रम वर्चुअली संपन्न हुआ, तो भी जो वेलकम इस सिरीज और इसके कलाकारों या इससे जुड़े लोगों को मिलना चाहिए था, वो शायद नहीं मिला. क्या एम्मी का महत्त्व ऑस्कर से कुछ कम है?

इसके संभावित कारणों पर बात फिर कभी. उससे पहले एक नजर सिरीज पर दौड़ाते हैं, जिसकी वजह से पहली बार इतना बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान हमारे देश के कलाकारों को मिला.

वो आए कनाडा से, सिरीज बनाकर दे गए  

दिल्ली क्राइम-सीजन 1, सात किस्तों वाली इस क्राइम ड्रामा वेब सिरीज का निर्देशन रिची मेहता ने किया है. कनाडा में जन्में और वहीं पले-बढ़े रिची एक लेखक भी हैं और अमाल (2007), सिद्धार्थ (2013) और आई विल फालो यू डाउन (2014) जैसी फिल्में बना चुके हैं. यह सिरीज साल 2012 दिल्ली गैंग रेप मामले में अभियुक्तों की धर-पकड़ और एकदम शुरूआती पुलिसिया जांच सहित कई अन्य बातों का चित्रण करती है. वारदात की पहली पुलिस कॉल से लेकर मुजरिमों के पकड़े जाने तक के वाकियों को संभावित एवं वास्तविक लोकेशंस पर यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया गया है. इसलिए यह कहीं कहीं  डाक्यूमेंटरी फिल्म का अहसास भी देती है. हालांकि यह सिरीज घटना से जुड़े पुलिस दस्तावेजों-जांच पर आधारित बताई जाती है, लेकिन इसमें असल किरदारों के नामों को बदल दिया गया है.

मसलन, सिरीज का संपूर्ण घटनाक्रम डीसीपी वर्तिका चतुर्वेदी (शेफाली शाह) और उनकी टीम के इर्द-गिर्द घूमता है, जो आईपीएस छाया शर्मा से प्रेरित बताया जाता है. हालांकि अगर इसके शिल्प की बात करें तो यह विशुद्ध रूप से एक मनोरंजक प्रस्तुति है, जो उस घटना को लेकर पल-पल तनाव का स्तर बढ़ाती रहती है. इस बात को लेकर भी चौंकाती है कि इतने कम समय में पुलिस ने कम संसाधनों, दबाव और तनाव के साथ इतनी गहन छानबीन को कैसे अंजाम दिया होगा.खैर, इस सिरीज की सिनेमायी समीक्षा और कई अलग-अलग पहलुओं को लेकर अलग से एक लेख लिखा जा सकता है. और न केवल शेफाली शाह का दमदार अभिनय, बल्कि साथी कलाकारों के योगदान, चुस्त लेखन, पार्श्व संगीत, फिल्मांकन आदि के विश्वस्तरीय रचनात्मक पहलुओं पर एक नये सिरे से चर्चा तो बनती है. लेकिन इससे पहले ये बात परेशान करती है कि तमाम फिल्मकार ऐसी शानदार प्रस्तुतियां बनाने में पीछे क्यों रहते हैं.

आखिर क्यों कनाडा, आस्ट्रेलिया या कहीं और से आये फिल्मकारों को ऐसी कहानियां आकर्षित कर जाती है, जिन पर हमारे फिल्मकारों की नजर तक नहीं जाती. और जाती भी है तो अक्सर वे फार्मूला संस्कृति का शिकार बन जाते हैं. निर्देशक के नाम के साथ मेहता सर नेम जुड़ा होने से पहली नजर में यही लगता है कि एनआरआई हुआ तो क्या, बंदा तो अपना ही है. लेकिन हमें ये भी देखना चाहिये कि सरनेम से अपना लगने वाले इस मुंडे ने इस 6-7 घंटे के कंटेंट को बनाने में चार साल का समय लगाया है.

बहरहाल, बात केवल दिल्ली क्राइम सिरीज की नहीं है. आप रिची मेहता की बाकी दो हिन्दी फिल्में भी देखिये और सोचिये कि हर तरह के संसाधन होने के बावजूद ऐसे कंटेंट को ज्यादा से ज्यादा क्यों नहीं बनाया जा रहा है. या कहीं सार्थक और समानांतर सिनेमा की तरह ओटीटी मंचों की प्रभावशाली प्रस्तुतियों पर भी मेनस्ट्रीम सिनेमा तो हावी नहीं हो रहा है?

ओटीटी कंटेंट की समस्याएं

ऐसा नहीं है कि ओटीटी मंचों पर दिखाई जाने वाली हर सामग्री में कुछ न कुछ गड़बड़ ही होती है. लेकिन ये भी सच है कि साफ-सुथरे कंटेंट के मामले में विभिन्न ओटीटी मंच, टेलिविजन जैसा भरोसा हासिल नहीं कर पाये हैं. हालांकि टीवी पर भी आजकल ऐसी कई चीजें देखने को मिल जाती है, जिनसे कई बार असहजता बढ़ जाती है. लेकिन एक बात से आप आश्वस्त रहते हैं कि अचानक से कोई मां-बहन की गाली नहीं देने लगेगा, जबकि ओटीटी पर रैम्प कैटवाक जैसा डर लगा रहता है कि कब ड्रेस या वर्ड मालफंक्शन हो जाये.

मसलन, क्राइम या माफिया आधारित कंटेंट का आरंभ और अंत, लुगदी साहित्य से आगे नहीं जा पाता इसलिए अपराध जगत पर बनाई गयी अच्छी सामग्री पर भी शक होने लगता है. या फिर राजनीतिक एवं धार्मिक पहलुओं पर बना कोई कंटेंट विवादों की भेंट चढ़ता दिख जायेगा, जबकि सेना को लेकर या खुफिया एजेन्सी के काम-काज पर कई अच्छी वेब सिरीज बनाई गयी हैं. वीर सपूतों और ऐतिहासिक घटनाओं से प्रेरित संदर्भों पर भी कई उदाहरण हैं, जो वाकई चौंकाते हैं.  लेकिन जब भी ओटीटी के कंटेंट पर चर्चा होती है तो बात घूम फिरकर अपशब्दों की भरमार, अंतरंग दृश्य और गाली-गुफ्तार पर आ जाती है. ऐसा लगता है कि 99 फीसदी कंटेंट में यही सब भरा होता है. अगर ये भ्रम है तो इसे ओटीटी मंचों को ही दूर करना चाहिए. शायद वे अपनी प्लेलिस्ट में कुछ सुधर करके ऐसा कर सकें.

हालांकि ऐसी किसी भी चीज को लेकर 18 प्लस या 16 प्लस जैसी चेतावनी भी दी जाती है. ये भी सुनिश्चित किया जाता है कि उपभोक्ता फलां फिल्म, सिरीज या कोई शो देखने से पहले पड़ताल कर सके कि इस कंकेंट में हिंसा, सेक्स सीन्स, अपशब्द वगैराह का इस्तेमाल किया गया है या नहीं. सबके अपने अलग-अलग तरीके हैं. लेकिन आप इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि एक्सक्लूसिव स्ट्रीमिंग का फायदा मिलने से 18 प्लस जैसा कंटेंट ही ज्यादा पसंद किया जाता है.

यह भी एक बड़ा कारण है कि आजकल ज्यादातर ओटीटी मंच अश्लीलता, गाली-गलौज और हिंसा के अत्याधिक चित्रण को बढ़ावा देने के आरोपों से घिरे नजर आते हैं, जबकि इन्हीं मंचों पर अच्छी खासी मात्रा में साफ-सुथरी, प्रभावशाली और प्रेरक सामग्री भी मौजूद होती है. बेशक, ऐसा कंटेंट नजरों में कम आ पाता हो या उसकी चर्चा मिर्जापुर 2 या पातालोक जैसी न होती हो. लेकिन अगर हमारे देश के कंटेंट को अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड्स समारोहों में सराहना मिल रही है, तो इसका मतलब है कि ओटीटी पर काफी कुछ अच्छा भी हो रहा है.

अच्छे-बुरे की बहस के बीच अवार्ड्स

जरा सोचिये कि बीते वर्ष 47वें इंटरनेशनल एम्मी अवार्डस में सैफ अली खान की सेक्रेड गेम्स वेब सिरीज, बेस्ट ड्रामा श्रेणी के तहत अवार्ड जीत तो कैसा रहता. इसके अलावा बीते वर्ष बेस्ट नॉन-स्क्रिप्टेड एंटरटेन्मेंट श्रेणी के तहत साधना सुब्रह्मन्यम द्वारा निर्देशित विटनेसः इंडियाज फोरबिडन लव, नामक डाक्टूमेंटरी को भी नॉमिनेशन मिला था जो कि आनर किलिंग पर आधारित थी. मीडिया में सेक्रेड गेम्स की खबर तो दिखाई दी थी, लेकिन यह डाक्यूमेंटरी लगभग गायब थी. क्या सेक्रेड गेम्स को विवाद में रहने का फायदा मिला? बीते वर्ष ही लस्ट स्टोरीज, को बेस्ट टीवी मूवी एवं मिनिसिरीज श्रेणी में और बेस्ट एक्ट्रेस (राधिका आप्टे) श्रेणी में नामिनेशन मिला. वैसे ये सिरीज भी खासी विवादों में रही है.

ये बात सही है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित फिल्म या टीवी समारोहों में नॉमिनेशन में भी नाम आने से खूब उत्साह बढ़ता है और ऐसा लगातार होने पर अवार्डस भी दूर नहीं रह पाते. लेकिन ऐसा तभी होगा, जब फिल्मकार ज्यादा से ज्यादा मात्रा में उम्दा किस्म का कंटेंट तैयार करते रहें और ओटटी या अन्य मंच उसे ठीक ढंग से लोगों के बीच प्रचारित करें.

एम्मी जैसे पुरस्कार का केवल नॉमिनेशन मिल जाने से क्या होता है, इसका अंदाजा आप विटनेसः इंडियाज फोरबिडन लव के उस पोस्टर को देखकर लगा सकते हैं, जो संभवतः जीत से चूक जाने के बाद बनाया जा सकता है. पोस्टर पर पहली लाइन में मोटे-मोटे अक्षरों में एम्मी का जिक्र है.

हमें यहां देखना चाहिये कि एम्मी में लगातार दो साल नॉमिनेशन में अच्छा परफार्म करने के बाद सफलता के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ा. दूसरी तरफ देखें तो ऑस्कर में नामांकन पाने वाली अंतिम भारतीय फिल्म लगान (2001) थी. उससे पहले मदर इंडिया (1957) और सलाम बांबे (1988) को ऑस्कर में नॉमिनेशन मिला था. दिल्ली क्राइम के अलावा 48वें एम्मी में बेस्ट एक्टर श्रेणी में अर्जुन माथुर (वेब सिरीज मेड इन हैवन) को नामिनेशन मिला तथा फोर मोर शाट्स प्लीज, को बेस्ट कामेडी सिरीज के तहत नामांकन मिला. अपने कंटेंट को लेकर ये दोनों ही सिरीज निशाने पर रही हैं, लेकिन एक एक्टर के रूप में आगे जाकर अर्जुन माथुर को इसका क्या फायदा मिलेगा यह देखना होगा.

शायद लोग उन्हें नाम से कम पहचानते हों. या शक्ल देखकर ये कहते हुए पहचान जाएं कि हां, बंदे को फलां फिल्म या सिरीज में देखा तो है. इस युवा कलाकार के संघर्ष की दास्तां को कम शब्दों ज्यादा ढंग से समझना है तो आप जोया अख्तर द्वारा निर्देशित फिल्म लक बाय चांस (2009) देख डालिये. इस फिल्म में उन्होंने अभिमन्यु नामक एक किरदार निभाया है, जो मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में कई वर्षों से संघर्ष कर रहा है. दिल्ली से आया उसका दोस्त विक्रम जयसिंह (फरहान अख्तर) रातों रात स्टार बन जाता है, जबकि अभिमन्यु उससे कहीं अच्छा कलाकार होने के बावजूद बस कहीं अटका है.

वर्ष 2004 में अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय और विवेक ओबेराय की फिल्म क्यों हो गया ना में एक कैमियो से अर्जुन ने फिल्मों में कदम रखा और तब से लेकर अब तक वह करीब दो दर्जन फिल्मों-वेब सिरीज में लीड से लेकर साइड तक कई रोल्स निभा चुके हैं. उनकी सिने यात्रा देखकर कोई सहजता से कह सकता है कि बंदे का अब टाइम आ गया, जबकि असलियत कुछ और है.

ओटीटी मंच से जुड़े कुछ अन्य अवार्ड्स का भी जिक्र करना यहां जरूरी लग रहा है. मनोज बाजपेयी अभिनीत दि फैमिलि मैन, सिरीज ने एशियन अकेडमी क्रिएटिव अवार्ड्स के एक नहीं बल्कि चार खिताब अपने नाम किये हैं. सीजन 2-फोर मोर शाट्स प्लीज को बुसान फेस्टिवल में एशियन कंटेंट अवार्ड्स 2020 मिला है. इसके अलावा इस सिरीज को छठे वेब सिरीज फेस्टिवल ग्लोबल, हालीवुड में बेस्ट वेब सिरीज का भी अवार्ड मिला है. राधिका आप्टे द्वारा निर्देशित उनकी पहली शार्ट फिल्म स्लीपवाकर को पाम स्प्रिंग इंटरनेशनल शार्ट फेस्ट में अवार्ड से नवाजा गया है.

दरअसल, ओटीटी मंचों की प्लेलिस्ट में मुख्य रूप से मसाला कैटेगरी की सामग्री हावी दिखती है. ऐसे में सार्थक सिनेमा या उस विचारधारा के आस-पास बुनी गयी सामग्री कहीं गुम सी हो जाती है. बड़े पर्दे पर मुख्यधारा सिनेमा को धीरे-धीरे मिटते हम सबने देखा है. ऐसे में ओटीटी मंचों से एक उम्मीद बंधती है कि वहां ऐसी सामग्री की न केवल आसानी से उपलब्धता है, बल्कि निर्माण का साहस और बाजार का जोखिम लेने की क्षमता भी है.

(डिसक्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)





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